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योगिनी तंत्र साधना मंत्र। Yogini Tantra Sadhana mantra.

योगिनी साधना कैसे की जाती है?
तंत्र विद्या कैसे सीखी जाती है?
यक्षिणी साधना क्या है?
मंत्र साधना क्या है?

योगिनी तंत्र साधना मंत्र

चौसठ योगिनी साधना, षोडश/चाँद/मधुमती योगिनी साधना, योगिनी तंत्र साधना मंत्र विधि- योगिनी साधना तंत्र विद्या के अंतर्गत अति महत्वपूर्ण साधना है. योगिनी तंत्र साधना और मन्त्र विधि के विधिवत पालन करने से इसे सिद्ध किया जा सकता है. योगिनी साधना में माँ आदि शक्ति को प्रसन्न करने के लिए साधना की जाती है. माँ काली अपनी योगिनियों के माध्यम से अपने भक्तों का कल्याण करती हैं.

योगिनी साधना एक बहुत ही प्राचीन तंत्र विद्या की विधि है. इसमें सिद्ध योगिनी या सिद्धि दात्री योगिनी की आराधना की जाती है. इस विद्या को कुछ लोग द्वतीय दर्जे की आराधना मानते हैं लेकिन ये सिर्फ एक भ्रांति है. योगिनी साधना करने वाले साधकों को बहुत ही आश्चर्यजनक लाभ होता है. हर तरह के बिगड़े कामों को बनाने में इस साधना से लाभ मिलता है. माँ शक्ति के भक्तों को योगिनी साधना से बहुत जल्द और काफी उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त होते हैं. इस साधना को करने वाले साधक की प्राण ऊर्जा में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है. माँ की कृपा से भक्त के जीवन की सारी मुश्किलें हल हो जाती हैं और उसके घर में सुख और सम्रद्धि का आगमन हो जाता है.

योगिनी तंत्र साधना मंत्र विधि इस प्रकार है-

इस साधना को रात्रि ग्यारह बजे के बाद करना चाहिए. इसे करने के लिए कृष्ण पक्ष की अष्ठमी का दिन उचित होता है. इसके अतिरिक्त कोई शुक्रवार या कोई भी नवमी भी इस साधना के लिए उत्तम समय होता है. इस साधना में लाल वस्तु का विशेष महत्त्व है, इसलिए अपना आसन, वस्त्र आदि लाल रंग के ही होने चाहिए. आप उत्तर की तरफ मुख करके बैठ जाएँ. अब आपने सामने एक लाल रंग का वस्त्र बिछा दें. इस वस्त्र पर अक्षत को कुमकुम से रंजित करके एक मैथुन चक्र निर्मित करें.

अब इस मैथुन चक्र के बीचों बीच ‘दिव्यकर्षण गोलक’ सिंदूर से रंजित करके स्थापित कर दें. आप ‘दिव्यकर्षण गोलक’ नही होने पर सुपारी का उपयोग भी कर सकते हैं. इस तरह से ‘दिव्यकर्षण गोलक’ स्थापित करने के बाद अपने गुरुदेव या भगवान गणेश की आराधना करें. अब गोलक या सुपारी को योगिनी स्वरूप मानकर पूजन करें. पूजन के लिए लाल रंग के पुष्प, हल्दी, कुमकुम, अक्षत आदि अर्पित करें और तिल्ली के तेल का दीपक जलाएं. अब गुड़ का भोग लगायें और अनार रस भी अर्पित करें.

अब एक रुद्राक्ष की माला लेकर “ओम रं रुद्राय सिद्धेस्वराय नम:” इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए एक माला जप पूरा करें. अब थोड़ा सा अक्षत लेकर उसमे कुमकुम मिला लें और नीचे दिए गए मन्त्रों का उच्चारण करते हुए स्थापित गोलक या सुपारी पर थोड़ा-थोड़ा अर्पित करते जाएँ. इस दौरान इन मन्त्रों का जप करें.
मन्त्र-
ओम ह्रीं सिद्धेस्वरी नम:
ओम ऐं ज्ञानेश्वरी नम:
ओम क्रीं योनि रूपाययै नम:
ओम ह्रीं क्रीं भ्रं भैरव रूपिणी नम:
ओम सिद्ध योगिनी शक्ति रूपाययै नम:

इस तरह से मन्त्र जाप पूरा होने पर आप इस एक दूसरे मन्त्र – “ओम ह्रीं क्रीं सिद्धाययै सकल सिद्धि दात्री ह्रीं क्रीं नम:” का इक्कीस बार रुद्राक्ष की माला से माला जप करें. जब आपका माला जप पूर्ण हो जाए तो अनार के दानों में थोड़ा सा घी मिलाकर अग्नि में 108 बार आहुति दें. इस तरह से योगिनी साधना करने पर अंतिम दिन एक अनार लेकर उसे जमीन पर जोर से पटके और उसका रस सीधे अग्नि को अर्पित करें. रस अर्पित करते हुए ‘सिद्ध योगिनी प्रसन्न हो’ यह जपते जाएँ. इस तरह से साधना संपन्न होने के अगले दिन पूजन और हवन आदि सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें. रोज पूजा में अर्पित अनार और गुड़ को साधक ग्रहण कर सकता है. पूजा में रखी गई सुपारी या गोलक को पोंछ कर साधक को अपने पास ही रखना चाहिए लेकिन वस्त्र आदि को प्रवाहित कर देना चाहिए.
योगिनी साधना के संपन्न होने पर कन्याओं को भोजन कराना भी उत्तम होता है. इसके अलावा माँ के मंदिर में मिठाई और दक्षिणा भी देना चाहिए. इस साधना के संपन्न होने पर साधक को कई शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं.

योगिनी साधना में सभी योगिनियों में सुरसुन्दरी को सबसे प्रमुख माना जाता है. भूत डामर तंत्र में सुरसुन्दरी की साधना के महत्व को बताया गया है. सुरसुन्दरी की साधना करने वाला साधक अपने हर तरह की मनोकामना की पूर्ति कर सकता है. सुरसुन्दरी के आराधना के लिए सुबह स्नान आदि करने के बाद साफ आसन पर बैठ जाएँ. इस बाद ‘ओम हौं’ इस मन्त्र से आजमन कर लें. इसके बाद ‘ओम हूँ फट’ मन्त्र जप करते हुए दिग्बंध करें. अब प्राणायाम करें और करऩ्गन्यास करें.

अब चौकी पर अष्ट दल कमल का मिर्माण करके सुरसुन्दरी का मनन करें. इस दौरान सुरसुन्दरी के ध्यान मन्त्र का जाप करें. यह मन्त्र इस प्रकार है – “पूर्ण चन्द्र निभां गौरीं विचित्राम्बर धारिणीम, पीनोतुंगकुचां वामां सर्वेषाम् अभयप्रदाम”
मन्त्र जप पूर्ण करने के बाद गुलाब के फूल, धूप, दीप, नैवेद से पूजा पूरी करें और मूल मन्त्र – ‘ओम ह्रीं आगच्छ सुरसुन्दरी स्वाहा’ का जप करें. इस तरह से इस साधना को दिन में तीन बार प्रात:, दोपहर और सायंकाल करना चाहिए.
सुरसुन्दरी की साधना किसी महीने के कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से शुरू करके लगातार पूर्णिमा तक करना चाहिए. जब सुरसुन्दरी प्रसन्न होकर साधक को दर्शन देती है तब साधक अपना वरदान मांग सकता है. साधक सुरसुन्दरी को किसी भी रूप में दर्शन कर सकता है. साधक माँ, बहन या पत्नी के रूप में सुरसुन्दरी को मान सकता है और उसी के अनुरूप संबोधित कर सकता है.

साधना के दौरान यदि साधक को सुरसुन्दरी दर्शन देती है तो साधक को पुष्प, चन्दन का अर्घ्य देना चाहिए. जब साधक सुरसुन्दरी को माता या बहन कहके बुलाता है तो वह उसे कई दिव्य चीज़ों का वरदान देती है और साधक को भूत भविष्य की समझ देती है. इसके अलावा माता मानने पर सुरसुन्दरी साधक का पुत्र मानकर रक्षा करती है. जब साधक सुरसुन्दरी को पत्नी मानकर संबोधित करता है तो उसे सुरसुन्दरी बहुत शक्तिशाली बना देती है और तीनों लोगों में उसका आगमन का मार्ग खोल देती हैं. ऐसी स्थिति में सुरसुन्दरी से साधक शारीरिक संबंध का सुख भी पाता है. लेकिन इसके बाद उसे किसी दूसरी स्त्री के ख्याल से भी परहेज करना होता है नही तो ये देवी कुपित हो जाती हैं.

योगिनी साधना के अंतर्गत चौसठ योगिनी साधना का भी विशेष महत्व चौसठ योगिनी साधना में देवी के चौसठ रूपों की आराधना की जाती है. इसके करने से साधक अपने जीवन के सभी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों से मुक्ति मिलती है. योगिकी साधना का तंत्र शास्त्र में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और साधक इस महत्वपूर्ण विद्या का लाभ लेकर अपने जीवन को मंगलमय कर सकता है.

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