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संतान प्राप्ति के योग – पुत्र प्राप्ति के योग कैसे बनते हैं ?

संतान प्राप्ति के योग

संतान प्राप्ति के योग – संतान प्राप्ति में आपकी कु्रडली में स्थित ग्रहों की दशा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान होता है। कुंडली के द्वारा यह जानना संभव है कि आपके भाग्य में कितनी संतानों का सुख है। यदि आपके जीवन में संतान प्राप्ति में कोई बाधा आ रही है, तो कुंडली में स्थित ग्रहों की स्थिति द्वारा उस बाधा के विषय में भी जाना जा सकता है। आपकी कुंडली में ग्रहों की स्थिति के बनने के भी अनेक कारण होते हैं, जिन्हें समझनें के लिए आइए कुछ उदाहरण देखते हैं –

  • यदि आपकी कुंडली में गुरू पाँचवें भाव में स्थित है और वह मज़बूत स्थिति में हैं, तो आपकी होने वाली संतान सदैव आपकी आज्ञा का पालन करने वाली होगी।
  • यदि आपकी कुंडली में पंचमेश बलवान है और वह लग्न, पंचम या नवम भाव में विराजमान है, साथ ही किसी भी पापी ग्रह की कुदृष्टि दस पर नहीं हैं, तो संतान उत्पत्ति में कोई बाधा नहीं आती।
  • कुंडली में यदि जन्म लग्न और चंद्रमा लग्न पाँचवें भाव के स्वामी बृहस्पति यदि किसी शुभ स्थान पर स्थित हैं, तो आपको अवश्य ही संतान की प्राप्ति होगी।
  • ज्योतिषशास्त्र में ऐसा माना जाता है कि यदि पंचमेश स्वगृही होने के साथ–साथ शुभ गृह भी हो, तो यह स्थिति संतान प्राप्ति के लिए अनुकूल मानी जाती है।
  • ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यदि कुंडली में बृहस्पति मज़बूत हो और लग्न का स्वामी पाँचवें भाव में विराजमान हो, तो सह स्थिति भी संतान कारक कहलाती है।
  • यदि एकादश भाव में बुध, शुक्र या चंद्र में से एक भी ग्रह की उपस्थिति हो, तो संतान प्राप्ति होती है। ऐसे ही पाँचवें भाव में मेष, वृष या कर्क राशि में केतू विराजमान हो, तो सरलता से संतान की प्राप्ति होती है।
  • कुंडली में यदि लग्नेश और नवमेश सातवें भाव में स्थित हों, तो संतान प्राप्त होती है। इसी प्रकार लग्नेश पर बृहस्पति की शुभ दृष्टि को भी दस अृष्टि से लाभदायक माना जाता है।
  • यदि नवम भाव में गुरू, शुक्र और पंचमेश की उपस्थिति हो, तो इसे उत्तम संतान योग माना जाता है।

ज्योतिष के अनुसार लग्न से पंचम भाव शुक्र और चंद्रमा के वर्ग में स्थित हों और चंद्रमा से संबंधित हो, तो ऐसे योग से अनेक संतान प्राप्ति होने की संभावना होती है, परंतु इसी स्थिति में यदि अशुभ गृहों की कुदृष्टि हो, तो संतान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होती है। पाँचवें भाव में यदि वृष, सिंह, कन्या या वृश्चिक राशि सूर्य के साथ में हों

आठवें भाव में शनि तथा लग्न स्थान पर मंगल की उपस्थिति हो, तो संतान प्राप्त करने में विलंब होता है।

संतान प्राप्ति के संबंध में ज्योतिष में पंचम भाव को अधिक महत्व दिया जाता है। इसका कारण यह है कि पंचम भाव संतान भाव भी कहलाता है। गुरू पंचम भाव का कारक ग्रह है, गुरू इस भाव का कारक होने के कारण संतान, ज्ञान और सम्मान प्रदान करता है। संतान प्राप्ति के लिए पंचम भाव का विशेष महत्व है, कुंडली में यदि इस योग में अशुभता हो, तो यह संतान से वियोग का कारण बनता है।

संतान के संबंध में पंचमेश तथा अष्टमेश का परिवर्तन योंग अशुभ योग माना जाता है। ऐसा योग संतान को उसकी पैतृक संपत्ति से दूर करता है। व्यक्ति स्वयं से असंतुष्ट और दुखी रहता है। यह योग स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

ज्योतिष के अनुसार संतान प्राप्ति के उपाय –

यदि किसी की कुंडली में सूर्य ग्रह नीच व शत्रु आदि राशि, नवांश में अशुभ फल देने वाला, अस्त भावों से युक्त होकर पंचम भाव में स्थित हो, तो संतान प्राप्ति में निश्चित तौर पर बाधा उत्पन्न होती है। ऐसे में यदि योग कारक ग्रह की पूजा  की जाए, उसे दान, हवन आदि से शांत किया जाए, तो यह उपाय बाधा को हरने वाला सिद्ध होता है और संतान का सुख प्रदान करता है।

फल दीपिका के अनुसार देखें –

एवं हि जन्म समये बहुपूर्वजन्मकर्माजितं दुरितमस्य वदन्ति तज्जाः।

ततद ग्रहोक्त जप दान शुभ क्रिया भिस्तददोषशान्तिमिह शंसतु पुत्र सिद्धयै।।

इसका अर्थ है कि हम जन्म कुंडली से से यह जान सकते हैं कि पूर्व में हमने ऐसे कौन से पाप किए हैं कि इस जन्म में हमें संतानहीनता का सामना करना पड़ रहा है। बाधाकारक ग्रहों अथवा उनके देवताओं की पूजा जाप, दान व हवन आदि शुभ क्रियाओं को करने से पुत्र की प्राप्ति होती है।

यदि संतानहीनता का कारण सूर्य है, तो यह पितृ पीड़ा है। पितरों की शांति हेतु गयाजी में पिंड दान करना चाहिए। हरिवंश पुराण को सुनना लाभकारी रहता है। सूर्य रत्न माणिक्य धारण करें, अवश्य ही लाभ होगा। रविवार के दिन सूर्योदय के बाद गेंहू, गुड़, केसर, लाल चंदन, लाल वश्त्र, तांबा, सोना और लाल रंग के फलों का दान करना चाहिए, ऐसा करने से शीघ्र ही संतान की प्राप्ति होती है। सूर्य के बीज मंत्र ‘ओम हृां हृीं हृों सः सूर्याय नमः’ का 7000 बार जाप करने से सूर्य कृत अनिष्टों से मुक्ति मिल जाती है। रविवार को मीठा व्रत रखने, गायत्री मंत्र का जाप करने तथा तांबे के पात्र में जल, लाल चंदन, लाल पुष्प  डालकर नित्य सूर्य को अध्र्य देने से भी संतान का सुख प्राप्त होता है। बेलपत्र की जड़ को विधिपूर्वक रविवार को लाल डोरी में पिरोकर धारण करने से भी इस संबंध में लाभ होता है।

वर्तमान में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जिनका मानना है कि बंश को आगे बढ़ाने के लिए लड़कों की आवश्यकता होती है। आज वह समय है, जब लड़कियाँ भी लड़कों के न केवल कदम से कदम मिलाकर चल रहीं है अपितु कुछ क्षेत्रों में तो लड़कों से भी आगे निकल गईं हैं। लोग पुत्र प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रकार के तंत्र–मंत्र–यंत्र का प्रयोग करने से भी नहीं चूकते, जो उन्हें लाभ के स्थान पर हानि भी पहँचा सकता है। ज्योतिष में पुत्र प्राप्ति के लिए अत्यन्त ही सरल उपाय सुझाए गए हैं। ऐसे ही एक सरल मंत्र को देखिए –

श्री गणपति जी की मूर्ति पर पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाली महिला प्रतिदिन स्नानादि से निवृत होने के पश्चात एक महीने तक इस मंत्र का जाप करे –

‘ ॐ पार्वतीप्रियनंदनाय नमः’ इस मंत्र की प्रतिदिन 11 माला जपने से अवश्य ही संतान की प्राप्ति होती है।

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